सरकारी गोलियाँ बहुजनों पर सीधे चलती हैं। यह कोई मिथक नहीं, बल्कि एक कटु सत्य है, जिसे हमसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता। चाहे वह एससी/एसटी आंदोलन हो, किसान आंदोलन हो या सीएए विरोधी आंदोलन—हर बार सरकार के इशारे पर पुलिस ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर सीधी गोली चलाकर हमारे लोगों की जान ली है।
आज संभल में हुई हिंसा में तीन मुसलमानों की जान गई है। इस घटना में कई पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं। मैं जल्द ही घायल पुलिसकर्मियों से मिलकर इस हिंसा की सच्चाई देश के सामने लाने का प्रयास करूंगा। साथ ही, मैं पुलिसकर्मियों को यह याद दिलाना चाहूंगा कि उनकी वर्दी संविधान ने दी है और उन्हें संविधान का ही पालन करना चाहिए, न कि किसी 'ऊपरी आदेश' का।
कल मैं संभल जाऊंगा और इस हिंसा में मारे गए लोगों के परिजनों से मुलाकात करूंगा। हम अपने पीड़ित परिवारों को अकेला नही छोड़ेंगे। आगामी संसद सत्र में मैं सरकार की आंखों में आंख डालकर कहूंगा कि हमारे लोगों की जान इतनी सस्ती नहीं है।
साथ ही, मैं संभल के नागरिकों से अपील करता हूं कि शांति बनाए रखें। हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है। हम अपनी लड़ाई लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से जारी रखेंगे।
यह लड़ाई केवल एक समुदाय की नहीं, बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों की है। आइए, हम सब मिलकर एकजुट रहें और संविधान के प्रति अपनी आस्था बनाए रखें।